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Vijaya Ekadashi Vrat /विजया एकादशी व्रत
फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को विजया एकादशी के नाम से जाना जाता है।विजया एकादशी का व्रत सभी व्रतों से उत्तम माना गया है. इस व्रत को विधिपूर्वक करने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट होतें हैं एवं दोनों लोकों में उसकी विजय अवश्य ही होती है.
विधि : दशमी के दिन स्वर्ण, चाँदी, ताँबा या मिट्टी का एक घड़ा बनाएँ ओर उसे जल से भर लें तथा पाँच पल्लव रख वेदिका पर स्थापित करें। उस घड़े के ऊपर जौ और नीचे सतनजा रखें। उस पर श्रीनारायण भगवान की स्वर्ण की मूर्ति स्थापित करें। एकादशी के दिन स्नानादि से निवृत्त होकर धूप, दीप, नैवेद्य, नारियल आदि से भगवान की पूजा करें। तत्पश्चात घड़े के सामने बैठकर दिन व्यतीत करें और रात्रि को भी उसी प्रकार बैठे रहकर जागरण करें। द्वादशी के दिन नित्य नियम से निवृत्त होकर उस घड़े को ब्राह्मण को दे दें।
सागार: विजया एकादशी व्रत में संघाड़े के सागार लेना चाहिए.
फल: जो मनुष्य इस व्रत के महात्म्य को पढ़ता या सुनता है, उसको वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।