काल सर्प योग(Kaal Sarp Yog)

कारण और प्रकार

kaal sarp

काल सर्प दोष /योग : जन्म  कुंडली में जब सारे ग्रह राहु और केतु के मध्य आ जाते हैं तब काल सर्प योग बनता है.

काल सर्प दोष के कारण जातक को जीवन में अनेक कठनाई का सामना करना पड़ सकता है. जीवन के हर मोड़ पर किसी न किसी तरह का अभाव रहता है. सफलता प्राप्त करने में कठिनाई और समय दोनों ही लगता है. इसके परिणाम अचानक दुर्घटना और संपत्ति विनाश कर देने वाले होते हैं.

काल सर्प दोष के लक्षण : काल सर्प योग से प्रभावित जातक को अकाल मृत्यु का भय बना रहता है. नींद में चौंकना, पानी और उचाई से डर एवं सदा कुछ न कुछ अशुभ या अप्रिय होने की आशंका मन में बनी रहती है.

काल सर्प योग में जन्मे जातक को प्रायः बुरे स्वप्न दिखाई देते हैं, नागों का स्वप्न में दिखाई देना, उसे मारना, उसके टुकड़े होते देखना, नदी, तालाब , कुएं व समुद्र का पानी देखना, पानी गिरना, मकान गिरना, स्वप्न में विधवा स्त्री को देखना. काल सर्प योग से ग्रस्त बालक नींद में बुरे स्वपनों के कारण बिस्तर गीला कर देते हैं. स्वप्न में शारीर पर सांप रेंग रहा हो ऐसे सभी स्वप्न अशुभ माने जाते हैं एवं कालसर्प योग की स्तिथि स्पष्ट करते हैं.

काल सर्प दोष/काल सर्प योग के नाम /प्रकार 

काल सर्प योग बारह प्रकार के होतें हैं.

अनंत कालसर्प योग

ग्रह स्तिथि: लग्न से सप्तम भाव तक होने वाले काल सर्प योग को अनंत काल सर्प योग कहते हैं,

प्रभाव: मानसिक अशांति, अस्थिरता, दुष्ट बुद्धि, छल कपट में रूचि, कष्टमय वैवाहिक जीवन, लम्पट स्वभाव ,बातों में झूठ का सहारा लेना, बिना कारण षड्यंत्रों में फंसे रहना, कोर्ट कचेहरी के मामलों में नुक्सान उठाना, जीवन भर अपनी प्रतिष्ठा पाने के लिए संघर्षरत रहना.

कुलित काल सर्प योग

ग्रह स्तिथि: द्वितीय स्थान से अष्टम भाव तक होने वाले काल सर्प योग को कुलित काल सर्प योग कहते हैं.

प्रभाव: स्वास्थ संकट, आर्थिक स्तिथि में अस्थिरता, संघर्षरत जीवन, आय से अधिक व्यय, अपयश, कटु वाणी, पारिवारिक कलह के कारण अशांति, विवाह विच्छेद की प्रबल संभावनाएं

वासुकी काल सर्प योग

ग्रह स्तिथि: तृतीया भाव से नवं भाव के मध्य सभी ग्रहों के आने के कारण वासुकी काल सर्प योग बनता है

प्रभाव: भाई बहन या पारिवारिक सदस्यों से कष्ट, मित्रों से धोखा, आजीविका में कठनाई, भाग्योदय में कठिनाई, विदेश प्रवास में कष्ट, क़ानूनी दस्तावेजों में लापरवाही के कारण नुक्सान, नास्तिक प्रवृत्ति

शंखपाल काल सर्प योग

ग्रह स्तिथि:चतुर्थ भाव से दशम भाव तक होने वाले काल सर्प योग को शंखपाल काल सर्प योग कहते है.

प्रभाव: कष्टमय जीवन, विद्या प्राप्ति में भी बाधाएं, चल अचल संपत्ति सम्बंधित कठिनाईयां, वाहन सम्बंधित कष्ट , नौकरों से परेशानी, माता को या माता के कारण जावन भर कष्ट , नौकरी अथवा व्यवसाय में उतार चढ़ाव, अधिक नुक्सान, चिंताजनक आर्थिक स्तिथि

पद्म काल सर्प योग

ग्रह स्तिथि:पंचम भाव से एकादश भाव के मध्य सभी ग्रहों के आ जाने से पद्म काल सर्प योग बनता है.

प्रभाव: संतान सुख का अभाव,  वृद्धावस्था में संतान से अलगाव, शत्रुयों से हानि, कारावास की संभावना, गुप्त रोग का भय,  रोग चिकित्सा में विलम्ब, जीवन साथी के साथ मतभेद, मित्रों या करीबी लीगों से विश्वास घात , सट्टा लाटरी में नुक्सान, हाथ में चोट की संभावना.

महा पद्म काल सर्प योग

ग्रह स्तिथि: छठे भाव से बाहरवें भाव के मध्य सभी ग्रहों के आ जाने से महा पद्म काल सर्प योग बनता है.

प्रभाव: असफल प्रेम सम्बन्ध, प्रेमिका या पत्नी से विछोह, संदेहास्पद चरित्र, मन में सदैव निराशा का भाव, शत्रुओं के हाथों परास्त

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तक्षक काल सर्प योग

ग्रह स्तिथि : सप्तम भाव से लग्न तक होने वाले काल सर्प योग को तक्षक काल सर्प योग कहते है.

प्रभाव: व्यवसाय में असफल भागीदारी, वैवाहिक जीवन में नुक्सान, घर में अशांति, अधिक शत्रु, दूसरों को दिया हुआ पैसों का डूबना, इन्द्रिजन्य गुप्त रोगों से पीड़ित होना पड़ता है.

कर्कोंटक कालसर्प योग

ग्रह स्तिथि:  अष्टम भाव से द्वितीय स्थान तक होने वाला काल सर्प योग को कर्कोटक कालसर्प योग कहते हैं.

प्रभाव: भाग्यादोय में अड़चन, पैत्रिक संपत्ति का उचित लाभ नहीं मिलता, व्यापार व्यवसाय में हानि, रोग, शस्त्राघात, विष से अकाल मृत्यु की संभावना प्रबल , मित्रों के द्वारा छल कपट के कारण हानि

शंखनाद काल सर्प योग.

ग्रह स्तिथि: नवम भाव से तृतीया भाव के मध्य सभी ग्रहों के आ जाने से शंखनाद काल सर्प योग बनता है.

प्रभाव: जीवन भर भाग्य का साथ न मिलना, शासन की ओर से अडचनें ,अल्प पिता स्नेह, व्यापारर व्यवसाय में पूर्ण लाभ की गुंजाईश होते हुए भी प्रत्यक्ष में हानि, रोगी संतान, नान नानी या दादी दादी से वियोग, माता पिता से विरह

विषाक्त काल सर्प योग

ग्रह स्तिथि: एकादश भाव से पंचम भाव के मध्य सभी ग्रहों के आ जाने से विषाक्त काल सर्प योग बनता है.

प्रभाव: जनम स्थान से दूरी, बड़े भाई से विवाद, संघर्ष पूर्ण जीवन, नेत्र पीड़ा , ह्रदय रोग, अनिद्रा की बिमारी, दुर्घटना से जीवन का अंत

शेषनाग कालसर्प योग

ग्रह स्तिथि: बाहरवें भाव से छठे स्थान तक होने वाले काल सर्प योग को शेषनाग कालसर्प योग कहते हैं.

प्रभाव: गुप्त शत्रुओं का सदा भय, लड़ाई झगडे में हार, जीवन भर बदनामी, मृत्यु के बाद यश प्राप्ति

 

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