" ज्योतिष भाग्य नहीं बदलता बल्कि कर्म पथ बताता है , और सही कर्म से भाग्य को बदला जा सकता है इसमें कोई संदेह नहीं है "
- पं. दीपक दूबे
" ज्योतिष भाग्य नहीं बदलता बल्कि कर्म पथ बताता है , और सही कर्म से भाग्य को बदला जा सकता है इसमें कोई संदेह नहीं है "
- पं. दीपक दूबे
Pt Deepak Dubey

कालाष्टमी

कालाष्टमी को भैरवाष्टमी के नाम से जाना जाता है। कालाष्टमी का हिंदू धर्म में बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। मार्गशीर्ष मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन भगवान शिव, भैरव रूप में प्रकट हुए थे। कालाष्टमी का व्रत इसी उपलक्ष्य में किया जाता है। कालाष्टमी भगवान शिव को समर्पित होती है। नारद पुराण के अनुसार इस दिन भगवान भोलेनाथ के भैरव रूप के स्मरण मात्र से ही सभी प्रकार के पाप और कष्ट दूर हो जाते हैं। भैरव की पूजा व उपासना से मनोवांछित फल की प्राप्ती होती है। इस दिन भैरव जी की पूजा-अर्चना करने व कालाष्टमी के दिन व्रत एवं पूजन करना अत्यंत शुभ एवं फलदायक माना गया है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन कालभैरव का दर्शन एवं पूजन मनवांछित फल प्रदान करता है।

शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को करने से घर में नकारात्मक उर्जा का वास नहीं होता है। इस दिन महादेव के रुद्रावतार भैरव की पूजा का विधान है। इस दिन कुत्ते को भोजन करवाना शुभ माना जाता है। हिंदू पंचाग के अनुसार हर माह की कृष्ण पक्ष अष्टमी को देवी काली का पूजन किया जाता है। इस दिन कालभैरव के साथ अपने पूर्वजों को याद किया जाता है। भगवान शिव के दो रुप हैं एक बटुक भैरव और दूसरा काल भैरव। बटुक भैरव रुप अपने भक्तों को सौम्यता प्रदान करते हैं और वहीं काल भैरव अपराधिक प्रवृत्तयों पर नियंत्रण करने वाले प्रचंड दंडनायक हैं। कालाष्टमी की रात को देवी काली की उपासना की जाती है।

कालाष्टमी से सम्बंधित कथा

भैरवाष्टमी या कालाष्टमी की कथा के अनुसार एक समय श्रीहरि विष्णु और ब्रह्मा के मध्य विवाद उत्पन्न हुआ कि उनमें से श्रेष्ठ कौन है। यह विवाद इस हद तक बढ़ गया कि समाधान के लिए भगवान शिव एक सभा का आयोजन करते हैं। इसमें ज्ञानी, ऋषि -मुनि, सिद्ध संत आदि उपस्थित थे। सभा में लिए गए एक निर्णय को भगवान विष्णु तो स्वीकार कर लेते हैं, किंतु ब्रह्मा जी संतुष्ट नहीं होते। वे महादेव का अपमान करने लगते हैं। शांतचित शिव यह अपमान सहन न कर सके और ब्रह्मा द्वारा अपमानित किए जाने पर उन्होंने रौद्र रूप धारण कर लिया। भगवान शंकर प्रलय के रूप में नजर आने लगे और उनका रौद्र रूप देखकर तीनों लोक भयभीत हो गए। भगवान शिव के इसी रूद्र रूप से भगवान भैरव प्रकट हुए। वह श्वान पर सवार थे, उनके हाथ में दंड था। हाथ में दंड होने के कारण वे दंडाधिपति कहे गए। भैरव जी का रूप अत्यंत भयंकर था। उनके रूप को देखकर ब्रह्मा जी को अपनी गलती का एहसास हुआ। वह भगवान भोलेनाथ एवं भैरव की वंदना करने लगे। ब्रह्मा, देवताओं और साधुओं द्वारा वंदना करने पर भैरव जी शांत हो जाते हैं।

पूजन विधि

इस दिन सफेद वस्त्र पर भैरव का चित्र बनाकर विधिपूर्वक व्रत पूजन करें। सरसों के तेल का चौमुखी दीपक जलाएं, धूप करें। चंदन का तिलक लगाएं। कालभैरव को सफेद कनेर के फूल चढ़ाएं। गाय के दूध से खीर का भोग लगाएं। थोड़ी सी खीर किसी काले कुत्ते को खिलाएं। काली देवी की उपासना करने वालों को अर्धरात्रि के बाद मां की उसी प्रकार से पूजा करनी चाहिए, जिस प्रकार दुर्गापूजा में सप्तमी तिथि को देवी कालरात्रि की पूजा का विधान है। भैरव की पूजा-अर्चना करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि के साथ स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है। भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अनेक समस्याओं का निदान होता है।

उपाय

आर्थिक लाभ पाने के लिए भैरव को जायफल चढ़ाएं। गृहक्लेश से छुटकारा पाने के लिए भैरव को अर्पित की हुई मौली मेन गेट पर बांधे। मानसिक अशांति दूर करने के लिए भैरव पर अर्पित 4 इमरती कुत्तों को खिलाएं।

पं धीरेन्द्र नाथ दीक्षित 

Astrotips Team


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