Surya Shanti Ke Upay/ सूर्य शांति के उपाय

सूर्य देव की समय के अनुसार उपासना करने से, सूर्यदेव सब कुछ प्रदान करते है , जैसे- दीर्घायु, आरोग्य, धन, ऐश्वर्य, पशु, मित्र, स्त्री, पुत्र तथा अनेकानेक उन्नति के व्यापक क्षेत्र व आठ प्रकार के भोग इत्यादि | 13 समस्त पापो की निवृति के लिए तथा अपने कल्याण के लिए सूर्ययाग विधि-विधान से करना चाहिए | यह याग मनुष्य के सभी रोगों का नाश करता हैं, एवं मनोवांछित फलो को ही प्रदान करता हैं | स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कहा हैं कि- शत्रुओं को समाप्त करने वाला, युद्द में विजय प्रदान करने वाला, धन और पुत्र को प्रदत्त करने वाला आदित्यह्रदय स्त्रोत’ ही हैं |

  • सूर्योदय के पहले उठ कर सभी कर्यो (नित्य क्रिया-स्नान, इत्यादि) से निवृत हो भगवान सूर्य को ताम्बे के पात्र (लोटा) से जल में लाल चन्दन डाल कर अर्ध्य देना चाहिए | (अर्ध्य देते समय विशेष ध्यान देने योग्य बात जल का पात्र सर के सामने दोनों हाथ ऊपर उठा कर प्रात: निकलते हुए भगवान सूर्य को अर्घ्य की जल धारा से दर्शन करते हुए देना चाहिए | ये पवित्र जल किसी गमले, पेड़ आदि में डाल दें | अर्घ्य इस प्रकार दे की उस गिरते हुए अर्घ्य जल का छींटा आपके पाव पर ना पड़े |)
  • संध्या समय जब सूर्य अस्त हो रहे हो तो नि:सन्देह अर्घ्य देकर प्रणाम करना पूर्णत: शास्त्र सम्मत कहा गया हैं| (विशेष दिवस पर संध्या समय और प्रात:समय दोनों वक़्त अर्घ्य दे पूजन किया जाता हैं |
  • सूर्य भगवान का बारह / इक्कीस/ एक सौ आठ नामों से युक्त स्त्रोत पाठ या “सूर्यसहस्त्रनाम” का विधिवत पाठ करना चाहिए
  • नेत्ररोग की पीड़ा से बचने के लिए ‘नेत्रोपनिषद’ का विधिपूर्वक पाठ करना चाहिए |
  • रविवार को व्रत करना, सूर्यास्त से पहले-पहले संध्या निकट बिना नमक (रोटी गुड) का भोजन करना चाहिए |
  • सूर्य उपासना करने वाले को शास्त्रों के मतानुसार रविवार को तेल, नमक तथा अदरक का सेवन कदापि नहीं करना चाहिए | रविवार के दिन ब्रह्मचर्य का पालन संयम से करना चाहिए |
  • आदित्य ह्रदय स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन करना चाहिए, लाभदायक होता हैं |
  • शास्त्रों के मतानुसार रविवार का व्रत करने तथा सूर्यदेव को प्रतिदिन अर्घ्य देने से चर्म रोग समाप्त हो जाते हैं |
  • महानिबंध के मत से “सूर्य के वैदिक अनुष्ठान से कुष्ठ, क्षय जैसे रोगों की शांति होती हैं, तथा सिर के समस्त रोगों का नाश, नेत्र-रोग व पेट रोग की समाप्ति होती हैं |
  • भगवान सूर्य के अनेक नाम मंत्र हैं किन्तु ‘ॐ सूर्याय नाम:’ या ‘ॐ घृणि सूर्याय नाम:’ का ही प्रयोग करना चाहिए |
  •  पूजा वैदिक विधि-विधान से किसी योग्य ब्राहमण द्वारा  या उनके देखा-रेख में करनी चाहिए |
  • कुंडली में सूर्य यदि पापग्रहों के साथ हो, विशेष रूप से शनि या राहु की युति में हो तो विधिवत “रुद्राभिषेक करना करना चाहिए |
  • नेत्र व्याधियों में “सूर्य नमस्कार”सहित नेत्रोपनिषद का नित्य पाठ करना चाहियें |
  • संक्रांति के दिन तुलादान भी सूर्य शांति में लाभदायक हैं |
  • संभव हो तो घर का मुख्य द्वार  पूर्व दिशा में रखें |
  • सूर्य कृत साधारण अरिष्टों में नवग्रह कवच सहित सूर्य-कवच एवं शतनाम का पाठ भी शुभ फल देता हैं |

दूषित सूर्य के लक्षण और उससे जनित रोग 

  • सिर पीड़ा
  • बुखार
  • क्षय रोग
  • अतिसार (de-hydration)
  • नेत्र रोग
  • चित्त विकार
  • हड्डियों के रोग
  • राजदंड

बिना ज्योतिषी के परामर्श प्रयोग करने से लाभ की जगह नुकसानदायक साबित हो सकता हैं ग्रहों की स्थितिनुसार ही उपचार करना श्रेष्यकर है |