" ज्योतिष भाग्य नहीं बदलता बल्कि कर्म पथ बताता है , और सही कर्म से भाग्य को बदला जा सकता है इसमें कोई संदेह नहीं है "
- पं. दीपक दूबे
" ज्योतिष भाग्य नहीं बदलता बल्कि कर्म पथ बताता है , और सही कर्म से भाग्य को बदला जा सकता है इसमें कोई संदेह नहीं है "
- पं. दीपक दूबे
Pt Deepak Dubey

कुंडली मिलान के बाद भी क्यों हो जाता है वैवाहिक जीवन दुष्कर ? 

सृष्टि के सृजन में विवाह एक महत्वपूर्ण घटना है , इसके माध्यम से ना केवल एक स्त्री और पुरुष का मिलन होता है बल्कि उनके माध्यम से सृष्टि का विस्तार भी होता है और संभवतः प्रकृति की दृष्टि  से यह विस्तार ही इसका सबसे बड़ा कारण भी है।
हिन्दू धर्म में विवाह को अत्यंत ही पवित्र माना गया है और इसी लिए इसके करने से पूर्व बहुत तरह की प्रक्रियाएं भी हैं , परन्तु उनमे से सबसे महत्वपूर्ण है वर – वधु के कुंडली का मिलान।
परन्तु क्या विवाह के लिए सिर्फ कुंडली का मिलान ही पर्याप्त है? कई लोगों का तर्क होता है कि पहले तो कुंडली नहीं मिलाई जाती थी तो कैसे विवाह चलता था ?
मेरा इस विषय पर सिर्फ यह मत है कि युगों – युगों से कुण्डलियाँ मिलायी जाती थी जहाँ स्त्रियों का सम्मान था , बीच में और आज भी बहुत से स्थानों पर स्त्रियों को सिर्फ घर के कार्यों और बच्चा पैदा करने तक सिमित रखा गया है जो अमानवीय है , परन्तु जहाँ स्त्री सिर्फ घरेलू कार्यों और संतान उत्पत्ति के लिए ना होकर एक जीवन साथी के रूप में मानी जाती है वहां कुंडली का मिलान आवश्यक है।
परन्तु कुंडली के मिलान के बावजूद ऐसा अक्सर देखा जाता है कि वैवाहिक जीवन अत्यंत ही दुष्कर है चाहे वह स्वास्थ्य के कारण हो या संतान ना होने के कारण और सबसे अधिक व्यक्तित्व के ना मिलने से आपसी विवाद के कारण वैवाहिक जीवन अत्यंत ही कष्टकारी और दुष्कर हो जाता है।
कुंडली मिलान में हम केवल अष्टकूट मिलान करते हैं और सिर्फ यह देखा जाता है कि भावी दंपत्ति में आपसी सामजंस्य कैसा रहेगा परन्तु कुंडली मिलान से पहले सभी को निम्न बातों का भी ध्यान रखना चाहिए जो कि वर – वधु के व्यक्तिगत कुंडली के विश्लेषण से ज्ञात किया जा सकता है और यह अत्यंत ही आवश्यक है  , जैसे –
वर – वधु का आयु विचार : यह लग्नेश और अस्टमेश की स्थिति से ज्ञात किया जा सकता है और यह अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यदि इसमें से किसी की कुंडली अल्प – आयु को दर्शा रही है तो यह भावी दंपत्ति के लिए ठीक नहीं है।
वर – वधु रोग विचार : इसका विचार भी लग्नेश , षष्टेश, चतुर्थेश और अष्टमेश तथा चन्द्रमा की स्थिति से किया जा सकता है , यदि दंपत्ति में से कोई भी निरंतर रोगी रहे तो यह भी एक स्वस्थ जीवन के लिए अच्छा नहीं है।
वर – वधु के व्यक्तिगत कुंडली में सप्तमेश की स्थिति का विचार : यह सबसे महत्वपूर्ण अंग है क्योंकि यदि कुंडली में सप्तम भाव पीड़ित है , या सप्तमेश वक्री है , या सप्तमेश छठें , आठवे , बारहवें भाव में बैठा है , या सप्तम भाव पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव है तो भले ही कुंडली मिलान में 36 के 36 गुण ही क्यों ना मिल जायें वैवाहिक जीवन दुष्कर ही रहेगा।
संतान की स्थिति : जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि वैवाहिक जीवन का मूलभूत आधार ही सृष्टि का विस्तार है , अतः भावी दंपत्ति के संतान की क्या स्थिति रहने वाली है इसका भी संज्ञान कुंडली मिलान से पहले ले लेना चाहिए।
मंगल की स्थिति : वैवाहिक जीवन के लिए मंगल स्थिति का देखना अत्यंत ही आवश्यक है , सामन्यतया हम दोनों कुंडलियों के मांगलिक होने पर विवाह की अनुमति दे देते हैं , परन्तु यह खतरनाक हो सकता है क्योंकि कुंडली किस भाव से मांगलिक हो रही है इसका अध्ययन अत्यतंत ही आवश्यक है (मांगलिक की विस्तृत चर्चा अपने अगले लेख में करूँगा) ।
क्या करें उपचार :
>यदि कुंडली में कोई ऐसा दोष हो जिसका निराकरण किया जा सकता है तो उसका उपचार विवाह से पूर्व करें , और इसके लिए किसी विशेषज्ञ ज्योतिषी से परामर्श लें।
>सप्तमेश के ख़राब होने की स्थिति में उसकी वैदिक शांति अवश्य कराएं क्योंकि उसका समाधान रत्न या किसी और विधि से संभव नहीं है।
>मंगल दोष की जाँच विधिवत कराएं और उपयुक्त मांगलिक वर /वधु से ही विवाह करें और वह भी मंगल शांति पूजा के बाद।
>यदि कुंडली में एक से अधिक दोष उपस्थित हैं या विवाह हो चूका है परन्तु अब निभाना असम्भव हो रहा है तो ‘माँ कात्यायनी का अनुष्ठान’ ही अंतिम विकल्प शेष रह जाता है।
शुभम भवतु 
शिवपसक ज्योतिषविद 
पं. दीपक दूबे

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