" ज्योतिष भाग्य नहीं बदलता बल्कि कर्म पथ बताता है , और सही कर्म से भाग्य को बदला जा सकता है इसमें कोई संदेह नहीं है "
- पं. दीपक दूबे
" ज्योतिष भाग्य नहीं बदलता बल्कि कर्म पथ बताता है , और सही कर्म से भाग्य को बदला जा सकता है इसमें कोई संदेह नहीं है "
- पं. दीपक दूबे
Pt Deepak Dubey

Sankashti Ganesh Chaturthi /Ganesh Chaturthi / Sankashti Chaturthi  /संकष्टी गणेश चतुर्थी / श्री गणेश चतुर्थी /संकष्टी चतुर्थी 

Rashifal 2019 /राशिफल 2019 

ganesh-Ji

Sankashti Chaturthi Tithi 2018/संकष्टी चतुर्थी तिथि 2018

Sankashti Chaturthi Tithi 2019/संकष्टी चतुर्थी तिथि 2019

Sankashti Chaturthi Tithi 2020/संकष्टी चतुर्थी तिथि 2020

संकष्टी चतुर्थी का त्यौहार भगवान गणेश जी को समर्पित है। श्रद्धालु  इस दिन अपने बुरे समय व जीवन की कठिनाईओं को दूर करने के लिए भगवान गणेश जी की पूजा करते हैं। हिन्दू पंचांग में हर मास में दो चतुर्थी तिथि होती है। पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी को ‘संकष्टी चतुर्थी’ कहा जाता है तथा अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष में आने वाली चतुर्थी को ‘विनायक चतुर्थी’ कहा जाता है।

भारत के उत्तरी एवं दक्षिणी राज्यों में संकष्टी चतुर्थी का त्यौहार विशेष रूप से मनाया जाता है। ‘संकष्टी‘ शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है जिसका मतलब होता है ‘कठिन समय से मुक्ति पाना। तामिलनाडू राज्य में इसे ‘संकट हरा चतुर्थी‘ के नाम से भी जाना जाता है। मंगलवार के दिन पड़ने वाली चतुर्थी को ‘अंगरकी चतुर्थी‘ भी कहा जाता है एवं इसे सबसे शुभ माना जाता है।

क्योंकि चन्द्र उदय का समय सभी शहरों के लिए अलग-अलग होता है इसीलिए ‘संकष्टी चतुर्थी’ के व्रत की तालिका का निर्माण शहर की भूगोलिक स्थिति को लेकर करना अत्यधिक जरुरी है। संकष्टी चतुर्थी के उपवास का दिन दो शहरों के लिए अलग-अलग हो सकता है। यह जरुरी नहीं है कि दोनों शहर अलग-अलग देशों में हों क्योंकि यह बात भारत वर्ष के दो शहरों के लिए भी मान्य है। संकष्टी चतुर्थी के लिए उपवास का दिन चन्द्रोदय पर निर्धारित होता है। जिस दिन चतुर्थी तिथि के दौरान चन्द्र उदय होता है उस दिन ही संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। इसीलिए कभी कभी संकष्टी चतुर्थी का व्रत, चतुर्थी तिथि से एक दिन पूर्व, तृतीया तिथि के दिन पड़ जाता है।

संकष्टी चतुर्थी का महत्व : शास्त्रों के अनुसार चतुर्थी के दिन चन्द्र दर्शन को बहुत ही शुभ माना जाता है। चन्द्रोदय के बाद ही व्रत पूर्ण होता है। मान्यता यह भी है कि जो व्यक्ति इस दिन व्रत रखता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। पूरे वर्ष में संकष्टी चतुर्थी के 13 व्रत रखे जाते हैं जो कि इसके क्रम हो सही बनाते हैं, प्रत्येक व्रत के लिए एक अलग व्रत कथा है।

व्रत की विधि : इस दिन भगवान गणेश की पूजा की जाती है। गणेशजी की पूज के बाद चंद्रमा की पूजा की जाती है। प्रात: काल नित्य कर्म से निवृत होकर विधि-विधान से गणेशजी की पूजा करें। गणपति के किसी भी श्लोक से आप उनकी स्तुति कर सकते हैं। इसके बाद उनकी आरती करें।

संध्या काल  पूजन: सूर्यास्त के बाद स्नान कर साफ कपड़े पहनें। अब विधिपूर्वक गणेश जी का पूजन के लिए एक कलश में जल भरकर रखें । धूप-दीप अर्पित करें। नैवेद्य के रूप में तिल तथा गुड़ के लड्डु, गन्ना, शकरकंद, अमरूद सहित अन्य मौसमी फल, गुड़, तिल तथा घी अर्पित करें। इसके पश्चात गणेशजी की कथा सुनें।

यह भी है रिवाज : सभी फल, गुड़ में पकाए गए शकरकंद, तिल और गुड़ को कूटकर बनाया गया तिलकुठ और नैवेद्य रात्रि भर बांस के बने हुए डलिया (टोकरी) से ढंककर रख दिया जाता है। अगली सुबह सूर्य को अर्ध्य देने के बाद घर के पुरुष विशेषतौर पर पुत्र इस डलिया का प्रसाद परिजनों में वितरित करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे भाई-बंधुओं में आपसी प्रेम बढ़ता है।

पूजन समापन विधि : गणेश पूजन के बाद चंद्रमा को अर्ध्य दें। धूप-दीप दिखाएं। चंद्रदेव से अपने परिवार की समृद्धि के लिए प्रार्थना करें। तिलकुट का प्रसाद गणपति पूजा के बाद ही ग्रहण कर लिया जाता है। जबकि फल इत्यादि अगले दिन वितरित किए जाते हैं।


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